ISRO का अब तक का सबसे भारी रॉकेट: Lunar Module Launch Vehicle (LMLV)

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) आज दुनिया की अग्रणी अंतरिक्ष एजेंसियों में से एक है। भारत की यह एजेंसी न केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों के लिए जानी जाती है, बल्कि कम लागत में सफल अंतरिक्ष मिशन पूरे करने की क्षमता के लिए भी प्रसिद्ध है। 1980 में SLV-3 से शुरुआत कर, ISRO ने PSLV, GSLV और LVM3 जैसे शक्तिशाली लॉन्च व्हीकल विकसित किए। अब ISRO अपने इतिहास का सबसे भारी रॉकेट बनाने जा रहा है,Lunar Module Launch Vehicle (LMLV), जो भारत की अंतरिक्ष क्षमता को एक नए स्तर पर ले जाएगा।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने हाल ही में घोषणा की है कि वह अपनी अब तक की सबसे भारी लॉन्च व्हीकल — Lunar Module Launch Vehicle (LMLV) — का निर्माण कर रहा है। इस महत्वाकांक्षी रॉकेट को विशेषकर चंद्र मिशनों और भारत के मानवीय अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए विकसित किया जा रहा है।

लॉन्च पैड पर खड़े इसरो के कम लागत वाले मॉड्यूलर लॉन्च व्हीकल (LMLV) की एक उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाली तस्वीर। रॉकेट सफेद है जिसमें नारंगी और भूरे रंग के विवरण हैं, और इस पर भारतीय तिरंगा और इसरो का लोगो दिखाई दे रहा है। यह लॉन्च के लिए तैयार है और चारों ओर सपोर्ट स्ट्रक्चर्स से घिरा हुआ है, जबकि बैकग्राउंड में साफ़ नीला आकाश है।
इसरो का लो-कॉस्ट मॉड्यूलर लॉन्च व्हीकल (LMLV) निर्माणाधीन – भारत के सस्ते और भरोसेमंद अंतरिक्ष प्रक्षेपण भविष्य की ओर एक कदम।

🔹 ISRO के लॉन्च व्हीकल्स का इतिहास

1. SLV-3 (Satellite Launch Vehicle – 3)

  • लॉन्च वर्ष: 1980
  • यह भारत का पहला स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान था।
  • SLV-3 ने रोहिणी उपग्रह को सफलतापूर्वक पृथ्वी की कक्षा में पहुँचाया।
  • क्षमता: लगभग 40 किलोग्राम पेलोड को निचली पृथ्वी कक्षा (LEO) में पहुँचाना।

👉 महत्व: यह भारत के लिए पहला कदम था जिसने हमें आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाया।

2. ASLV (Augmented Satellite Launch Vehicle)

  • लॉन्च वर्ष: 1987
  • PSLV से पहले, ASLV को विकसित किया गया ताकि अधिक भारी उपग्रह ले जाए जा सकें।
  • क्षमता: लगभग 150 किलोग्राम LEO में।
  • हालांकि, इसके शुरुआती लॉन्च ज्यादातर असफल रहे।

👉 महत्व: असफलताओं से सीखते हुए ISRO ने बेहतर तकनीक विकसित की।

3. PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle)

  • पहली उड़ान: 1994
  • भारत के सबसे सफल रॉकेट्स में से एक।
  • क्षमता: 1,750 किलोग्राम तक का पेलोड ध्रुवीय कक्षा (Polar Orbit) और लगभग 1,200 किलोग्राम तक का पेलोड जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में।
  • PSLV को “वर्कहॉर्स ऑफ ISRO” कहा जाता है क्योंकि इसने अब तक 50 से अधिक सफल मिशन पूरे किए हैं।

👉 महत्व: 2017 में PSLV-C37 ने 104 उपग्रहों को एक साथ लॉन्च कर विश्व रिकॉर्ड बनाया।

4. GSLV (Geosynchronous Satellite Launch Vehicle)

  • पहली उड़ान: 2001
  • क्षमता: 5,000 किलोग्राम तक का पेलोड GTO में।
  • इसमें क्रायोजेनिक इंजन का इस्तेमाल किया गया, जिसे विकसित करना भारत के लिए बड़ी चुनौती थी।
  • GSLV ने संचार उपग्रहों और मौसम उपग्रहों को लॉन्च करने में अहम भूमिका निभाई।

👉 महत्व: यह भारत को भारी संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने की क्षमता देता है।

5. LVM-3 (Launch Vehicle Mark-3) / GSLV Mk-III

  • पहली उड़ान: 2014 (Sub-orbital test)
  • 2017 से नियमित प्रक्षेपण।
  • क्षमता: 8,000 किलोग्राम LEO और 4,000 किलोग्राम GTO में।
  • इसे भारत का “Fat Boy” कहा जाता है।
  • प्रमुख मिशन:
    • चंद्रयान-2 (2019)
    • गगनयान मिशन के लिए मनुष्य को अंतरिक्ष में भेजने का काम यही रॉकेट करेगा।

👉 महत्व: यह भारत को वैश्विक स्तर पर भारी उपग्रह प्रक्षेपण में सक्षम बनाता है।

🔹 ISRO का सबसे भारी रॉकेट Lunar Module Launch Vehicle (LMLV): आने वाला नया युग

ISRO अब अपने इतिहास का सबसे भारी और सबसे शक्तिशाली रॉकेट बनाने की दिशा में काम कर रहा है।
पहले इस रॉकेट को NGLV (Next Generation Launch Vehicle) या HLV (Heavy Lift Vehicle) कहा जा रहा था। NGLV को विशेष रूप से भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (Bharatiya Antariksh Station) के मॉड्यूल्स को अंतरिक्ष में भेजने के लिए डिज़ाइन किया गया था।

हालांकि, अब यह योजना बदल दी गई है और इसके स्थान पर LMLV (Next Generation Heavy Lift Launch Vehicle) को NGLV का विकल्प माना जा रहा है।

LMLV की डिजाइन में NGLV की कई तकनीकी योजनाओं और विशेषताओं को शामिल किया गया है।

(स्रोत: The Indian Express, CivilsDaily)

इस रॉकेट की विशेषताएँ (संभावित)

  • यह SpaceX के Falcon-9 और Falcon Heavy की तरह होगा।
  • पुन: प्रयोग योग्य (Reusable) डिज़ाइन, ताकि लागत कम हो।
  • भविष्य में मानव मिशनों और डीप-स्पेस मिशनों में इस्तेमाल होगा।

👉 महत्व: इस रॉकेट के आने से भारत बड़े आकार के संचार उपग्रह, अंतरिक्ष स्टेशन मॉड्यूल और इंटरप्लानेटरी मिशन भेज सकेगा।

🔹 क्यों ज़रूरी है इतना भारी रॉकेट?

  1. अंतरिक्ष में प्रतिस्पर्धा – SpaceX, Blue Origin, China और Russia पहले से बड़े रॉकेट बना रहे हैं।
  2. मानव मिशन (Gaganyaan) – भविष्य में ISRO को चंद्रमा और मंगल पर मानव भेजने की तैयारी करनी है।
  3. भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन – ISRO 2035 तक अपना खुद का स्पेस स्टेशन बनाने की योजना बना रहा है।
  4. वाणिज्यिक लाभ – भारी रॉकेट्स से विदेशी ग्राहकों के बड़े उपग्रह लॉन्च कर ISRO अरबों डॉलर कमा सकता है।

LMLV के प्रमुख तथ्य

नाम और उद्देश्य

  • इस रॉकेट का नाम Lunar Module Launch Vehicle (LMLV) रखा गया है। यह विशेषकर चंद्र मिशनों के लिए डिजाइन किया जा रहा है। The Indian Express+1
  • इसे भारत का अब तक का सबसे भारी रॉकेट माना जा रहा है। The Indian Express

आकार और समयसीमा

  • LMLV का आकार एक 40-storey (तकरीबन 120 मीटर) ऊँची عمارت जितना है, जो वर्तमान में ISRO का सबसे शक्तिशाली रॉकेट LVM-3 से बहुत बड़ा है। The Indian ExpressThe Times of India
  • यह रॉकेट 2035 तक तैयार होने की उम्मीद है। The Indian Express+1

पेलोड क्षमता

  • निचली पृथ्वी कक्षा (LEO) में इसके द्वारा 80 टन तक पेलोड भेजा जा सकता है। The Indian ExpressVision IAS
  • चंद्रमा तक यह रॉकेट लगभग 27 टन पेलोड ले जा सकेगा। The Indian ExpressVision IAS

संरचना और तकनीकी विशेषताएँ

  • यह एक तीन-स्तरीय रॉकेट है:
    • पहले दो स्तर लिक्विड प्रोपेलेंट (तरल ईंधन) का उपयोग करते हैं।
    • तीसरे स्तर में क्रायोजेनिक प्रोपेलेंट होगा।
    • पहले चरण के साथ दो स्ट्रैप-ऑन बूस्टर और 27 इंजनों का संयोजन होगा। The Indian ExpressCivilsDaily

क्यों खास है LMLV?

1. चंद्र अभियान के लिए तैयार

  • भारत की पहली मानवयुक्त चंद्र मिशन की योजना 2040 के आसपास के लिए है, और यह रॉकेट उसे सफल बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाएगा। The Indian Express+1

2. भारी पेलोड का समर्थन और गहराई से अन्वेषण

  • 80 टन LEO में और 27 टन चंद्रमा तक ले जाने की क्षमता, भारत को बड़े मॉड्यूल, अंतरिक्ष स्टेशन निर्माण सामग्री और भारी उपकरण भेजने में सक्षम बनाएगी।

3. अंतरिक्ष स्टेशन सामग्री के प्रक्षेपण में सहायक

  • ISRO ने भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन (Bharatiya Antariksh Station – BAS) 2035 तक बनाने की योजना बनाई है। LMLV इसके भारी मॉड्यूल्स को कक्षा में भेजने में अहम रोल निभाएगा। The New Indian ExpressWikipedia

4. तकनीकी प्रदर्शन और आत्मनिर्भरता

  • यह रॉकेट ISRO की तकनीकी क्षमता, खासकर लिक्विड और क्रायोजेनिक इंजन प्रणालियों का प्रदर्शन है।
  • पूरी तरह भारत द्वारा विकसित यह पहल आत्मनिर्भरता और विश्वस्तरीय स्पेस टेक्नोलॉजी का प्रतिबिम्ब है।

5. वैश्विक प्रतियोगिता में कदम

  • LMLV के लॉन्च से ISRO उन स्पेस एजेंसियों और कंपनियों की श्रेणी में आ जाएगा जो भारी भार क्षमताओं वाले सुपर हेवी-लिफ्ट रॉकेट संचालित करते हैं (जैसे कि SpaceX Falcon Heavy, NASA SLS आदि)।

🔹 ISRO के भविष्य की योजनाएँ

  • गगनयान मिशन (2025-26): भारत का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन।
  • चंद्रयान-3 की सफलता के बाद चंद्रयान-4: और गहरे वैज्ञानिक अध्ययन।
  • मंगल मिशन-2 (Mangalyaan-2): उन्नत तकनीक के साथ।
  • शुक्रयान (Shukrayaan): शुक्र ग्रह के लिए मिशन।
  • भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (2035 तक): भारत की स्वतंत्र अंतरिक्ष उपस्थिति।

सारांश

ISRO का Lunar Module Launch Vehicle (LMLV) एक महत्वाकांक्षी और सामर्थ्यवान सुपर-हेवी रॉकेट है, जो भारत की मानवयुक्त चंद्र अभियान योजनाओं, अंतरिक्ष स्टेशन निर्माण और भविष्य की डीप-स्पेस खोजों के लिए नया युग लेकर आएगा। इसका विकास भारत की तकनीकी उपलब्धियों और अंतरिक्ष यात्रा की दिशा में एक बड़े कदम की ओर इशारा करता है।

SLV-3 से लेकर LVM-3 तक, और अब सबसे भारी रॉकेट (LMLV) – ISRO की यह यात्रा भारत की वैज्ञानिक क्षमता, मेहनत और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। आने वाले वर्षों में, यह नया रॉकेट न केवल भारत को अंतरिक्ष शक्तियों की पहली पंक्ति में खड़ा करेगा बल्कि हमें चंद्रमा, मंगल और उससे आगे के मिशनों तक पहुँचाएगा।

FAQS

LMLV रॉकेट का मुख्य उद्देश्य क्या है?

Lunar Module Launch Vehicle (LMLV) का मुख्य उद्देश्य भारत के चंद्र मिशनों और भविष्य के मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियानों के लिए भारी पेलोड को अंतरिक्ष में भेजना है। यह रॉकेट भारत को अंतरिक्ष स्टेशन मॉड्यूल्स, बड़े उपग्रह और डीप-स्पेस मिशनों में सक्षम बनाएगा।

LMLV रॉकेट का आकार और संरचना कैसी होगी?

LMLV लगभग 40-स्टोरी (करीब 120 मीटर) ऊँचा होगा और इसमें तीन मुख्य स्तर होंगे। पहले दो स्तर लिक्विड प्रोपेलेंट और तीसरा स्तर क्रायोजेनिक इंजन द्वारा संचालित होगा, जिससे यह भारी पेलोड को अंतरिक्ष में ले जाने में सक्षम होगा।

LMLV की पेलोड क्षमता कितनी होगी?

यह रॉकेट निचली पृथ्वी कक्षा (LEO) में लगभग 80 टन पेलोड और चंद्रमा तक लगभग 27 टन पेलोड भेजने में सक्षम होगा। इसकी क्षमता इसे भारत का अब तक का सबसे भारी रॉकेट बनाती है।

LMLV और NGLV में क्या अंतर है?

NGLV (Next Generation Launch Vehicle) पहले ISRO की योजना थी, जिसे अंतरिक्ष स्टेशन मॉड्यूल और भारी उपग्रहों के लिए बनाया जाना था। बाद में इसे बंद कर दिया गया और LMLV को NGLV की तकनीक और डिज़ाइन का उन्नत विकल्प बनाया गया।

LMLV भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में क्यों महत्वपूर्ण है?

LMLV भारत को भारी और जटिल मिशनों में सक्षम बनाता है, जैसे कि मानवयुक्त चंद्र मिशन, अंतरिक्ष स्टेशन मॉड्यूल लॉन्च और भविष्य के डीप-स्पेस अभियानों में। यह भारत की अंतरिक्ष आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए एक बड़ा कदम है।

LMLV कब तक तैयार होने की उम्मीद है?

ISRO का अनुमान है कि LMLV 2035 तक पूरी तरह विकसित और परीक्षणों के बाद संचालन के लिए तैयार हो जाएगा। यह रॉकेट भारत के चंद्र और अन्य अंतरिक्ष मिशनों में क्रांतिकारी भूमिका निभाएगा।

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विकिपीडिया- NGLV के बारे में जानकारी

चंद्र मॉड्यूल प्रक्षेपण यान (LMLV)

चंद्र मिशन के लिए इसरो अब तक का सबसे भारी रॉकेट बना रहा है-Indian Express

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