बायोफोटोन उत्सर्जन (Biophoton Emission): क्या आपने कभी सोचा है कि हम सभी इंसान, जानवर और पौधे हल्की-सी अदृश्य रोशनी छोड़ते हैं? वैज्ञानिकों ने पाया है कि वास्तव में हर जीवित प्राणी से बेहद सूक्ष्म स्तर पर प्रकाश (Light) निकलता है, जिसे हम आँखों से नहीं देख सकते। इस घटना को अल्ट्रावीक फोटोन एमिशन (Ultraweak Photon Emission – UPE) या बायोफोटोन उत्सर्जन (Biophoton Emission) कहा जाता है।
यह खोज जितनी रहस्यमयी लगती है, उतनी ही वैज्ञानिक रूप से गहरी है। इस “जीवित प्रकाश” का संबंध हमारे मेटाबॉलिज़्म, कोशिकाओं की गतिविधि, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और जीवन शक्ति से है। दिलचस्प बात यह है कि जैसे ही जीवन समाप्त होता है, यह प्रकाश भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।

🔹 बायोफोटोन (Biophoton) क्या है?
बायोफोटोन (Biophoton) शब्द का अर्थ है – जीवित प्राणियों द्वारा उत्सर्जित बेहद सूक्ष्म और कमज़ोर प्रकाश।
- यह प्रकाश नग्न आंखों से दिखाई नहीं देता।
- इसकी तीव्रता साधारण रोशनी से लगभग 1000 गुना कमजोर होती है।
- इस प्रकाश को देखने के लिए वैज्ञानिक फोटोमल्टिप्लायर ट्यूब्स (Photomultiplier Tubes) और CCD कैमरों जैसी हाई-टेक मशीनों का उपयोग करते हैं।
पहली बार 1920 के दशक में सोवियत वैज्ञानिक अलेक्ज़ेंडर गुरविच (Alexander Gurwitsch) ने यह खोज की कि जीवित कोशिकाएँ एक-दूसरे से किसी तरह के “प्रकाश सिग्नल” के ज़रिए संवाद करती हैं। उन्होंने इसे “माइटोजेनिक रेडिएशन” कहा। बाद में 1970 और 1980 के दशक में जर्मन वैज्ञानिक फ्रिट्ज़-अल्बर्ट पॉप (Fritz-Albert Popp) ने इस विषय पर गहन रिसर्च की और “बायोफोटोन” शब्द को वैज्ञानिक रूप से लोकप्रिय किया।
🔹 यह कैसे काम करता है? – शरीर से रोशनी क्यों निकलती है
हमारे शरीर की हर कोशिका एक “केमिकल फैक्ट्री” की तरह काम करती है। जब कोशिकाओं के अंदर ऊर्जा उत्पन्न होती है, तो कुछ रासायनिक प्रतिक्रियाएँ होती हैं। इन प्रतिक्रियाओं में से कुछ Reactive Oxygen Species (ROS) और फ्री रेडिकल्स बनते हैं।
➡️ जब ये फ्री रेडिकल्स शरीर में अन्य अणुओं (Molecules) से प्रतिक्रिया करते हैं, तो बहुत छोटे-छोटे फोटोन (Photon) यानी प्रकाश कण निकलते हैं।
➡️ यही प्रकाश बायोफोटोन उत्सर्जन कहलाता है।
इसे ऐसे समझें:
- जैसे कोई बल्ब जलने पर रोशनी छोड़ता है, वैसे ही हमारी कोशिकाएँ भी काम करते हुए “माइक्रो-लेवल पर चमकती” हैं।
- फर्क सिर्फ इतना है कि यह रोशनी इतनी सूक्ष्म होती है कि हमें कभी दिखाई नहीं देती।
🔹 24 घंटे का रोशनी चक्र
जापान के वैज्ञानिकों ने 2009 में यह खोज की कि मानव शरीर यह हल्की रोशनी लगातार छोड़ता है, लेकिन इसकी इंटेंसिटी (Intensity) दिनभर में बदलती रहती है।
- सुबह और दोपहर में यह रोशनी सबसे ज्यादा चमकदार होती है।
- रात में यह रोशनी कमज़ोर हो जाती है।
इसका सीधा संबंध हमारे बॉडी क्लॉक (Circadian Rhythm) और मेटाबॉलिज़्म से है। यानी हमारा शरीर दिन-रात सिर्फ सक्रियता में ही नहीं, बल्कि “प्रकाश उत्सर्जन” में भी बदलाव करता है।
🔬 वैज्ञानिक शोध और प्रयोग
बायोफोटोन उत्सर्जन (Biophoton Emission) पर दुनिया के कई देशों में गहन शोध हुआ है।
1. जापानी शोध (2009 – Kyoto University & Tohoku Institute of Technology)
जापान के वैज्ञानिकों ने अत्याधुनिक CCD कैमरे और फोटोमल्टिप्लायर ट्यूब्स का इस्तेमाल कर यह साबित किया कि मानव शरीर लगातार हल्की रोशनी उत्सर्जित करता है। उन्होंने पाँच स्वस्थ व्यक्तियों को अंधेरे कमरे में रखा और पाया कि –
- शरीर से निकलने वाली यह रोशनी चेहरे और सिर पर सबसे अधिक होती है।
- यह प्रकाश हर 24 घंटे में बदलता है।
- सबसे अधिक चमक दोपहर के समय होती है और रात में कम हो जाती है।
इससे साबित हुआ कि बायोफोटोन का सीधा संबंध सर्केडियन रिदम (Circadian Rhythm) से है।
2. फ्रिट्ज़-अल्बर्ट पॉप (जर्मनी)
जर्मन वैज्ञानिक फ्रिट्ज़-अल्बर्ट पॉप को बायोफोटोन रिसर्च का जनक कहा जाता है। उन्होंने यह सिद्धांत दिया कि –
- बायोफोटोन सिर्फ “बेकार का उपउत्पाद” नहीं है, बल्कि यह कोशिकाओं के बीच सूचना आदान-प्रदान (Information Transfer) का माध्यम हो सकता है।
- यानी हमारी कोशिकाएँ आपस में प्रकाश संकेतों से संवाद करती हैं।
- इसका मतलब यह भी है कि प्रकाश हमारे शरीर में सिर्फ ऊर्जा ही नहीं, बल्कि “सूचना वाहक” (Information Carrier) की भूमिका निभाता है।
3. यूरोपीय और चीनी शोध
यूरोप और चीन के कई संस्थानों ने भी पाया कि –
- बीमार व्यक्तियों के शरीर से निकलने वाली बायोफोटोन तीव्रता में बदलाव होता है।
- कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों में यह उत्सर्जन असामान्य पैटर्न दिखाता है।
👉 इसका मतलब यह हो सकता है कि भविष्य में बायोफोटोन मापकर बीमारियों का शुरुआती पता लगाया जा सकेगा।
⚰️ मृत्यु के समय यह प्रकाश क्यों मिट जाता है?
बायोफोटोन उत्सर्जन जीवन का प्रतीक है, क्योंकि यह कोशिकाओं की सक्रियता और ऊर्जा उत्पादन से जुड़ा है। जब कोई व्यक्ति मरता है –
- मेटाबॉलिज़्म (Metabolism) रुक जाता है – कोशिकाएँ अब ऊर्जा उत्पन्न नहीं करतीं।
- रासायनिक प्रतिक्रियाएँ बंद हो जाती हैं – फ्री रेडिकल्स और ROS का उत्पादन कम हो जाता है।
- कोशिकाओं का टूटना शुरू होता है – और प्रकाश का उत्सर्जन धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।
इसीलिए वैज्ञानिक कहते हैं – “जीवित शरीर रोशनी छोड़ता है, लेकिन मृत्यु के साथ यह प्रकाश भी बुझ जाता है।”
यह विचार दार्शनिक दृष्टि से भी गहरा है, क्योंकि कई परंपराएँ मानती हैं कि आत्मा = प्रकाश है।
🌱 अन्य जीवों में बायोफोटोन
यह सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि –
- पौधे –
- हरी पत्तियाँ प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के दौरान बायोफोटोन छोड़ती हैं।
- जब पौधा तनाव (Stress) में होता है, तो उसके बायोफोटोन पैटर्न बदल जाते हैं।
- जानवर –
- मछलियों, मेंढ़कों और छोटे स्तनधारियों (Mammals) के शरीर से भी यही सूक्ष्म रोशनी निकलती है।
- यह बताता है कि जीवन और रोशनी का रिश्ता सार्वभौमिक है।
- बैक्टीरिया और सूक्ष्मजीव –
- सूक्ष्म स्तर पर भी बायोफोटोन मौजूद है।
- इससे यह सिद्ध होता है कि “प्रकाश” जीवित प्राणियों की एक मौलिक विशेषता है।
🧘 बायोफोटोन और योग/ध्यान/आध्यात्मिक दृष्टिकोण
हालाँकि बायोफोटोन पर आधुनिक विज्ञान आधारित है, लेकिन यदि हम आध्यात्मिक और प्राचीन परंपराओं की ओर देखें तो कई रोचक समानताएँ दिखाई देती हैं।
🔹 भारतीय दर्शन और योग
भारतीय ग्रंथों में “प्रकाश” और “तेज” को जीवन और आत्मा से जोड़ा गया है।
- प्राण ऊर्जा को अक्सर चमक या ओज के रूप में वर्णित किया गया है।
- योग और ध्यान करने वाले लोगों के चेहरे पर अक्सर विशेष आभा देखी जाती है।
- यह संभव है कि ध्यान और प्राणायाम जैसी प्रक्रियाएँ शरीर के मेटाबॉलिज़्म और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को संतुलित करती हैं, जिससे बायोफोटोन उत्सर्जन भी बेहतर होता है।
🔹 ध्यान और बायोफोटोन रिसर्च
कुछ छोटे शोध बताते हैं कि ध्यान करने वाले व्यक्तियों में बायोफोटोन उत्सर्जन पैटर्न अलग होते हैं।
- उनकी कोशिकाओं से निकलने वाली यह रोशनी अधिक “समन्वित” (Coherent) होती है।
- इसका अर्थ यह हो सकता है कि ध्यान शरीर और मन को एक संतुलित अवस्था में ले आता है।
🔹 आध्यात्मिक दृष्टिकोण
कई परंपराएँ मानती हैं कि जीवन स्वयं प्रकाश है। जब जीवन समाप्त होता है तो यह प्रकाश भी मिट जाता है। यह धारणा विज्ञान की खोजों से कहीं न कहीं मेल खाती है।
🚀 भविष्य में बायोफोटोन के उपयोग
वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में बायोफोटोन टेक्नोलॉजी चिकित्सा जगत में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है।
1. बीमारियों की प्रारंभिक पहचान
- कैंसर, डायबिटीज़, न्यूरोलॉजिकल विकार जैसी बीमारियाँ कोशिकाओं में ऑक्सीडेटिव बदलाव लाती हैं।
- इससे बायोफोटोन पैटर्न बदल जाते हैं।
👉 अगर इन्हें समय रहते मापा जाए तो बीमारियों का शुरुआती पता लगाया जा सकता है।
2. हेल्थ मॉनिटरिंग
भविष्य में बायोफोटोन मापने वाली मशीनें ऐसे “हेल्थ स्कैनर” बन सकती हैं जो बिना खून की जाँच किए हमारे स्वास्थ्य की स्थिति बता देंगी।
3. एंटी-एजिंग और वेलनेस
कुछ शोध बताते हैं कि बायोफोटोन उत्सर्जन की गुणवत्ता हमारे बुढ़ापे और सेहत से जुड़ी हो सकती है।
- जिन लोगों का शरीर अधिक “कोहेरेंट लाइट” छोड़ता है, उनकी कोशिकाएँ स्वस्थ और लंबी उम्र वाली हो सकती हैं।
4. कृषि और पर्यावरण
- पौधों में बायोफोटोन मापकर उनकी सेहत और स्ट्रेस स्तर का पता लगाया जा सकता है।
- इससे कृषि उत्पादन बढ़ाने और बीमारियों से बचाने में मदद मिल सकती है।
❓ FAQs – अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बायोफोटोन उत्सर्जन (Biophoton Emission) क्या है?
यह एक वैज्ञानिक घटना है जिसमें हमारा शरीर सूक्ष्म और अदृश्य प्रकाश छोड़ता है। इसे Ultraweak Photon Emission (UPE) भी कहा जाता है।
क्या मानव शरीर वास्तव में रोशनी छोड़ता है?
हाँ, वैज्ञानिकों ने पाया है कि मानव शरीर हल्की अदृश्य रोशनी छोड़ता है, जिसे बायोफोटोन उत्सर्जन कहते हैं। यह हमारी कोशिकाओं की रासायनिक गतिविधियों से पैदा होती है।
मृत्यु के समय यह प्रकाश क्यों मिट जाता है?
क्योंकि मृत्यु के बाद शरीर का मेटाबॉलिज़्म रुक जाता है और बायोफोटोन उत्सर्जन धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है।
क्या योग और ध्यान बायोफोटोन उत्सर्जन को प्रभावित कर सकते हैं?
शुरुआती शोध बताते हैं कि ध्यान और योग करने वाले लोगों में बायोफोटोन उत्सर्जन अधिक संतुलित और कोहेरेंट होता है।
भविष्य में बायोफोटोन उत्सर्जन का क्या महत्व होगा?
इसका उपयोग बीमारियों की शुरुआती पहचान, स्वास्थ्य निगरानी और चिकित्सा में क्रांति लाने के लिए किया जा सकता है।
🏁 निष्कर्ष
बायोफोटोन उत्सर्जन हमें यह याद दिलाता है कि जीवन और प्रकाश का रिश्ता गहरा और रहस्यमय है।
- हम सभी इंसान, पौधे और जानवर लगातार एक सूक्ष्म चमक छोड़ते हैं।
- यह रोशनी हमारे स्वास्थ्य, हमारी कोशिकाओं और हमारे जीवन की स्थिति का प्रतिबिंब है।
- मृत्यु के साथ यह प्रकाश बुझ जाता है, मानो जीवन का दीपक धीरे-धीरे समाप्त हो गया हो।
आधुनिक विज्ञान इसे मेटाबॉलिज़्म और रासायनिक प्रतिक्रियाओं का परिणाम मानता है, जबकि प्राचीन परंपराएँ इसे प्राण और आत्मा का प्रकाश कहती हैं।
👉 चाहे वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो या आध्यात्मिक – संदेश एक ही है: जीवन स्वयं प्रकाश है।



