एक्सोप्लानेट्स (Exoplanets या extrasolar planets) वे ग्रह हैं जो हमारे सौरमंडल से बाहर किसी अन्य तारे के चारों ओर परिभ्रमण करते हैं। सरल भाषा में: अगर कोई ग्रह किसी ऐसे तारे के चारों ओर घूमता है जो हमारा सूर्य नहीं है, तो वह एक एक्सोप्लानेट कहलाता है।
मानव सभ्यता ने हज़ारों सालों से रात के आसमान की ओर देखा है और यह सवाल पूछा है – “क्या हम इस ब्रह्मांड में अकेले हैं?” 🌌। विज्ञान और तकनीक की प्रगति ने इस सवाल को और गहराई दी है। पिछले 30 वर्षों में वैज्ञानिकों ने 6,000 से भी अधिक एक्सोप्लानेट्स (Exoplanets) की खोज कर ली है – यानी ऐसे ग्रह जो हमारे सौरमंडल से बाहर अन्य तारों की परिक्रमा करते हैं।
लेकिन इस विशाल उपलब्धि के बावजूद, एक असली “Earth 2.0” – यानी हमारे जैसे आकार, वातावरण और जीवन योग्य परिस्थितियों वाला एक्सोप्लानेट – अब तक नहीं मिला है।

🪐 कब और कैसे शुरू हुई एक्सोप्लानेट्स की खोज?
1992 में वैज्ञानिकों ने पहली बार ऐसे ग्रहों के ठोस प्रमाण पाए। ये ग्रह एक पल्सर (PSR B1257+12) के चारों ओर खोजे गए थे। यह खोज चौंकाने वाली थी, क्योंकि पल्सर एक न्यूट्रॉन स्टार होता है – यानी सुपरनोवा विस्फोट के बाद बचा हुआ मृत तारा। इतने चरम वातावरण में ग्रहों का होना उस समय की वैज्ञानिक धारणाओं को चुनौती देता था।
इसके बाद 1995 में मिशेल मेयर (Michel Mayor) और डिडिए क्वेलोज़ (Didier Queloz) ने सूर्य जैसे तारे 51 Pegasi के चारों ओर एक विशाल गैस ग्रह की खोज की। इसे 51 Pegasi b नाम दिया गया और यह पहला “Hot Jupiter” था। इस खोज ने खगोल-विज्ञान की दुनिया में क्रांति ला दी और दोनों वैज्ञानिकों को बाद में 2019 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार भी मिला।
इसके बाद के दशकों में, तकनीक में तेज़ी से सुधार हुआ:
- 2000 के दशक में कई “Hot Jupiters” और “Super-Earths” की खोज हुई।
- 2009 में लॉन्च हुआ Kepler Space Telescope ने हजारों ग्रह खोजकर आँकड़ों का बड़ा भंडार दिया।
- TESS (2018) और James Webb Space Telescope (2021) ने न सिर्फ नए ग्रह खोजने की गति बढ़ाई, बल्कि उनके वायुमंडल और संरचना को भी समझना शुरू किया।
आज, इन खोजों ने हमें यह एहसास दिलाया है कि हमारी आकाशगंगा में अरबों ग्रह मौजूद हैं, और उनमें से कई शायद पृथ्वी जैसे भी हो सकते हैं।
🌍 एक्सोप्लानेट्स कैसे दिखते हैं — प्रकार
- गैस दानव (Gas Giants) — बड़े, हल्के गैसीय ग्रह जैसे Jupiter; बहुत बड़े द्रव्यमान और मोटे वायुमंडल।
- Neptune-प्रकार के ग्रह — Jupiter जितने बड़े नहीं, पर हाइड्रोजन/हीलियम के बजाय हल्के वॉलैटाइल्स और ices वाले होते हैं।
- Super-Earths — पृथ्वी से बड़े लेकिन गैसीय दानव जितने बड़े नहीं; कठोर सतह या भारी वायुमंडल दोनों संभव हैं।
- Rocky / Earth-sized ग्रह — चट्टानी ग्रह, छोटे आकार और जीवन के लिए उपयुक्त सतह की संभावना।
- असामान्य/अनक्लासिफाइड — कुछ ग्रह इतने अजीब हैं कि उन्हें पारंपरिक वर्गीकरण में डालना कठिन होता है (उदा. बहुत घनी या बहुत हल्की चीज़ें)।
📜 एक्सोप्लानेट्स खोजने की प्रमुख विधियाँ
- Transit Method (ट्रांज़िट विधि)
- जब कोई ग्रह अपने तारे के सामने से गुजरता है तो तारे की चमक में थोड़ी गिरावट आ जाती है। इस छोटे से dip को नापकर ग्रह का आकार, कक्षा अवधि और कभी-कभी वायुमंडलीय जानकारी मिलती है।
- प्रमुख मिशन: Kepler, TESS।
- मजबूत पक्ष: छोटे और पृथ्वी-आकार के ग्रह ढूँढने में प्रभावी।
- सीमा: तब ही काम करती है जब ग्रह हमारे दृष्टि-रेख (line-of-sight) में तारे के सामने से गुजरे।
- Radial Velocity (डॉपलर / गतिबिम्ब विधि)
- ग्रह अपने तारे को हल्का-सा खींचता/झटका देता है — जिससे तारे की स्पेक्ट्रा में रेड/ब्लू शिफ्ट आता है। इस wobble से ग्रह का द्रव्यमान और कक्षा के बारे में जानकारी मिलती है।
- मजबूत पक्ष: ट्रांज़िट न होने पर भी ग्रह पकड़े जा सकते हैं; द्रव्यमान का आकलन देता है।
- सीमा: छोटे (Earth-mass) ग्रहों के लिए सिग्नल बहुत छोटा होता है — संवेदनशील उपकरण चाहिए।
- Direct Imaging (सीधा चित्रण)
- तारे की तेज़ रौशनी को ब्लॉक करके (coronagraph/starshade) ग्रह की रोशनी सीधे पकड़ना। यह तरीका बड़े, दूर और गरम ग्रहों के लिए उपयोगी है।
- चुनौती: तारा बहुत चमकीला होता है; ग्रह बहुत फीका दिखाई देता है।
- Gravitational Microlensing (सूक्ष्म लेंसिंग)
- जब एक दूर का तारा किसी मध्यवर्ती तारे के सामने से गुजरता है तो गुरुत्वाकर्षण लेंसिंग से प्रकाश अस्थायी रूप से बढ़ जाता है; इसमें ग्रहों के संकेत भी दिख सकते हैं।
- फायदा: बहुत दूर या छोटे ग्रह भी मिल सकते हैं; नुकसान: घटना सामान्यतः एकबारगी होती है (repeatable नहीं)।
- Timing Methods (पल्सर/ट्रांज़िट टाइमिंग वेरिएशन)
- विशेष परिस्थितियों में जैसे पल्सर टाइमिंग या ट्रांज़िट के समय में होने वाले छोटे बदलाव, अन्य ग्रहों के अस्तित्व का संकेत देते हैं।
❓ क्यों शुरुआत में ज्यादातर बड़े और पास के ग्रह मिले?
डिटेक्शन तकनीकें प्राकृतिक रूप से बड़े, नज़दीकी और छोटे-समय-कक्षाओं वाले (short-period) ग्रहों को जल्दी पकड़ती हैं — इसलिए शुरुआती सूचियों में “Hot Jupiters” और बड़े ग्रह ज़्यादा दिखे। छोटे, दूर और पृथ्वी-जैसे ग्रहों का पता लगाना तकनीकी रूप से कठिन है—इसीलिए अभी भी Earth-टाइप दुनिया ढूँढना चुनौतिपूर्ण है।
🔭 वायुमंडल और जीवन की खोज — कैसे जाना जाता है?
- Transmission spectroscopy (ट्रांज़िट के दौरान तारे की रोशनी जो ग्रह के वायुमंडल से गुज़रती है) से वायुमंडलीय गैसों के सिग्नेचर मिलते हैं — जैसे पानी (H₂O), मीथेन (CH₄), कार्बन-डायऑक्साइड (CO₂) आदि।
- Biosignatures (जीवन के सूचक): ऑक्सीजन, ओज़ोन, मीथेन का संयोजन और असामान्य गैस अनुपात जीवन का संकेत दे सकते हैं — पर इन्हें गलत-सकारात्मक कारणों से सावधानी से जाँचना पड़ता है।
- नए उपकरण (जैसे JWST और अगले जनरेशन के टेलीस्कोप) वायुमंडलों का विश्लेषण कहीं बेहतर कर रहे हैं।
✨ एक्सोप्लानेट्स से हमें क्या मिलता है?
- ब्रह्माण्ड में हमारी स्थिति और संभावित भविस्य (अंतरतारकीय अन्वेषण के दृष्टिकोण से)।
- ग्रह निर्माण के मॉडल की जाँच—कैसे और कहाँ ग्रह बनते हैं।
- जीवन की संभाव्यता और वैरायटी का अध्यययन—क्या पृथ्वी जैसी दुनिया दुर्लभ है या आम?
📊 NASA का 6,000+ Exoplanets का आँकड़ा
NASA ने 2025 तक पुष्टि की है कि कुल 6,000 से ज़्यादा एक्सोप्लानेट्स खोजे जा चुके हैं। इनका वर्गीकरण कुछ इस प्रकार है:
- 🌌 लगभग 2,000 गैस दानव ग्रह (Super Jupiters की तरह)
- 🌊 लगभग 2,000 नेपच्यून जैसे ग्रह
- 🪐 1,761 सुपर-अर्थ (Super-Earths) – यानी पृथ्वी से बड़े लेकिन गैस दानवों से छोटे ग्रह
- 🌍 लगभग 700 चट्टानी पृथ्वी जैसे ग्रह
- ❓ 7 अजीब ग्रह जिन्हें अभी तक किसी श्रेणी में फिट नहीं किया जा सका
NASA की नवीनतम खोजों में KMT-2023-BLG-1896L b खास है, जो एक नेपच्यून-जैसा ग्रह है और उसका द्रव्यमान पृथ्वी से लगभग 16 गुना अधिक है।
🚀 NASA के प्रमुख मिशन जिन्होंने यह संभव बनाया
1. Kepler स्पेस टेलीस्कोप
- 2009 में लॉन्च हुआ।
- इसने लगभग 2,700 एक्सोप्लानेट्स खोजे।
- इसका फोकस “Habitable Zone” यानी जीवन योग्य क्षेत्र पर था।
2. TESS (ट्रांजिटिंग एक्सोप्लानेट्स सर्वे सैटेलाइट)
- 2018 से सक्रिय।
- यह छोटे-छोटे तारों के चारों ओर छोटे ग्रह खोजने में मदद करता है।
3. जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST)
- 2021 में लॉन्च हुआ।
- इसका मकसद केवल ग्रहों की गिनती करना नहीं बल्कि उनके वायुमंडल का अध्ययन करना भी है।
🌍 Earth 2.0 की तलाश क्यों मुश्किल है?
- Habitable Zone का आकार छोटा होता है – तारे से न ज्यादा पास, न ज्यादा दूर।
- ग्रह के पास सही आकार और द्रव्यमान होना चाहिए ताकि उसका वायुमंडल टिक सके।
- पानी का अस्तित्व होना ज़रूरी है।
- वायुमंडल में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड का संतुलन चाहिए।
- सबसे बड़ी समस्या – इतनी दूर स्थित छोटे ग्रहों को देखना बेहद कठिन है।
💫 जीवन की संभावना (Habitability)
वैज्ञानिक मानते हैं कि अब तक खोजे गए कुछ एक्सोप्लानेट्स पर जीवन की संभावना हो सकती है। इनमें से कुछ सबसे प्रसिद्ध उदाहरण हैं:
🌍 Kepler-452b – “Earth’s Cousin”
- यह ग्रह 2015 में खोजा गया था और इसे “Earth’s Cousin” कहा जाता है।
- इसका आकार पृथ्वी से लगभग 60% बड़ा है और यह अपने तारे की Habitable Zone में स्थित है।
- वैज्ञानिक मानते हैं कि इस ग्रह पर तरल पानी मौजूद हो सकता है, लेकिन इसकी सतह पर परिस्थितियाँ पृथ्वी से कुछ अधिक कठोर हो सकती हैं।
⭐ Proxima Centauri b
- यह ग्रह हमारे सबसे नज़दीकी तारे Proxima Centauri (सिर्फ 4.24 प्रकाश वर्ष दूर) के चारों ओर घूमता है।
- यह भी Habitable Zone में है और इसका आकार पृथ्वी के समान है।
- हालांकि, इसके तारे से निकलने वाले तेज़ रेडिएशन और फ्लेयर्स वहाँ जीवन की संभावना को चुनौतीपूर्ण बना सकते हैं।
🪐 TRAPPIST-1 System
- यह एक अनोखा ग्रह तंत्र है जिसमें 7 पृथ्वी-आकार के ग्रह पाए गए हैं।
- इनमें से 3 ग्रह Habitable Zone में आते हैं, जहाँ पानी और जीवन की संभावना हो सकती है।
- इस खोज ने वैज्ञानिक समुदाय में काफी उत्साह पैदा किया, क्योंकि यह पहली बार था जब इतने अधिक पृथ्वी जैसे ग्रह एक ही तारे के चारों ओर पाए गए।
🚫 अब तक जीवन का ठोस सबूत क्यों नहीं मिला?
- अब तक मिले ग्रह बहुत दूर हैं, जिससे उनका सीधा अध्ययन मुश्किल है।
- वायुमंडलीय गैसों की जाँच से कुछ संकेत मिलते हैं, लेकिन बायोसिग्नेचर (जीवन के संकेत) को प्रमाणित करना अभी कठिन है।
- हमारे पास ऐसी तकनीक सीमित है जो दूरस्थ ग्रहों की सतह या जीवन के संकेतों को सीधे देख सके।
👉 यही कारण है कि वैज्ञानिक अभी भी “Earth 2.0” की तलाश को अगली बड़ी चुनौती मानते हैं।
🌌 क्या हम ब्रह्मांड में अकेले हैं?
NASA के वैज्ञानिक कहते हैं कि हमारी खोज बस शुरुआत है।
- हमें अबतक Earth 2.0 नहीं मिला है।
- लेकिन आँकड़े बताते हैं कि पृथ्वी जैसे अरबों ग्रह मौजूद हो सकते हैं।
- अगली पीढ़ी के टेलीस्कोप हमें और गहराई से इन ग्रहों के वातावरण, सतह और जलवायु को समझने में मदद करेंगे।
🌟 भारत की भूमिका
भारत भी इस अंतरिक्ष खोज में पीछे नहीं है।
- ISRO ने Astrosat जैसे उपग्रह से ब्रह्मांडीय विकिरण और तारों के अध्ययन में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
- आने वाले मिशन ExoWorlds और Aditya-L1 जैसी परियोजनाएँ अंतरिक्ष विज्ञान और ग्रहों की खोज को नई दिशा देने वाली हैं।
- भारतीय खगोलशास्त्री NASA और ESA के साथ मिलकर डेटा विश्लेषण, कंप्यूटर सिमुलेशन और मॉडलिंग में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं।
- NCRA (पुणे) की Giant Metrewave Radio Telescope और IIA (बैंगलोर) की Indian Astronomical Observatory जैसी वेधशालाएँ भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जुड़े प्रोजेक्ट्स में भाग ले रही हैं।
- भविष्य में भारत, वैश्विक स्तर पर एक्सोप्लानेट्स के वायुमंडल और जीवन की संभावना से जुड़े शोध में और बड़ी भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है।
📖 निष्कर्ष
30 साल पहले जो विज्ञान कथा जैसा लगता था, आज वह हक़ीक़त है।
NASA ने अब तक 6,000 से ज़्यादा एक्सोप्लानेट्स खोजे हैं – जिनमें से कुछ पृथ्वी जैसे दिखते हैं, लेकिन एक असली Earth 2.0 अभी तक नहीं मिला।
💡 हो सकता है कि आने वाले दशक में, जब तकनीक और टेलीस्कोप और बेहतर होंगे, तो हम अपने सवाल का जवाब पा सकें –
“क्या हम सच में अकेले हैं?”
📚 FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
एक्सोप्लानेट्स (Exoplanets) की खोज कैसे की जाती है?
वैज्ञानिक मुख्य रूप से दो तरीकों का इस्तेमाल करते हैं – ट्रांज़िट मेथड और रेडियल वेलोसिटी मेथड। ट्रांज़िट में ग्रह जब अपने तारे के सामने से गुजरता है तो तारे की रोशनी थोड़ी कम हो जाती है, जिससे ग्रह का आकार और कक्षा समझी जाती है। रेडियल वेलोसिटी मेथड में तारे की हल्की-सी “डगमगाहट” मापकर ग्रह की उपस्थिति का पता लगाया जाता है।
क्या अब तक खोजे गए किसी एक्सोप्लानेट्स पर जीवन संभव है?
अब तक किसी भी ग्रह पर जीवन का ठोस प्रमाण नहीं मिला है। हालांकि, Kepler-452b, Proxima Centauri b और TRAPPIST-1 सिस्टम जैसे ग्रहों पर जीवन के अनुकूल परिस्थितियाँ हो सकती हैं। लेकिन, वहाँ की सतह और वायुमंडल की वास्तविक स्थिति का सीधा पता लगाना अभी हमारी तकनीक के लिए कठिन है।
क्या सभी एक्सोप्लानेट्स पृथ्वी जैसे होते हैं?
नहीं। अब तक खोजे गए अधिकांश ग्रह पृथ्वी जैसे नहीं हैं। इनमें गैस दानव (Jupiter जैसे), बर्फीले नेपच्यून जैसे, और सुपर-अर्थ ग्रह शामिल हैं। केवल कुछ ही ग्रह आकार और स्थिति के हिसाब से पृथ्वी जैसे दिखते हैं, लेकिन उनकी परिस्थितियाँ फिर भी बहुत अलग हो सकती हैं।
भविष्य में एक्सोप्लानेट्स की खोज में कौन-सी तकनीक मदद करेगी?
James Webb Space Telescope (JWST) और आने वाले मिशन जैसे ESA का PLATO और NASA का Roman Space Telescope ग्रहों के वायुमंडल का गहराई से अध्ययन कर पाएंगे। ये मिशन हमें ग्रहों के तापमान, रासायनिक संरचना और संभावित “बायोसिग्नेचर” की जानकारी देंगे।
“Earth 2.0” खोजने में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
सबसे बड़ी चुनौती दूरी है। अधिकांश संभावित “Earth-like” ग्रह हमसे सैकड़ों या हजारों प्रकाश वर्ष दूर हैं। उनकी सतह और वातावरण को सीधे देखना आज की तकनीक से लगभग असंभव है। यही कारण है कि वैज्ञानिक उन्नत टेलिस्कोप और स्पेस मिशन विकसित कर रहे हैं।



