ITER प्रोजेक्ट: मानव सभ्यता की सबसे बड़ी ज़रूरत है – ऊर्जा। आज पूरी दुनिया बिजली, ईंधन और औद्योगिक उत्पादन के लिए ऊर्जा पर निर्भर है। लेकिन जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोल, डीज़ल, गैस) सीमित हैं और इनके इस्तेमाल से जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण बढ़ रहा है। यही कारण है कि वैज्ञानिक दशकों से ऐसी तकनीक खोज रहे हैं जो स्वच्छ, सुरक्षित और असीमित ऊर्जा दे सके।
इसी खोज में फ्रांस के दक्षिणी हिस्से में एक विशाल वैज्ञानिक प्रयोग चल रहा है – ITER प्रोजेक्ट। यह दुनिया का सबसे बड़ा न्यूक्लियर फ्यूज़न रिएक्टर है, जिसे “स्टार इन अ बॉटल” यानी “बोतल में तारा” कहा जाता है। हाल ही में इस प्रोजेक्ट में एक ऐसी उपलब्धि हासिल हुई है जिसने विज्ञान जगत को हिला दिया – एक ऐसा सुपरमैग्नेट, जिसकी ताकत पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से 2.8 लाख गुना ज़्यादा है।

🔬 ITER प्रोजेक्ट क्या है?
ITER का पूरा नाम है International Thermonuclear Experimental Reactor।
- यह प्रोजेक्ट दक्षिण फ्रांस के Saint-Paul-lès-Durance शहर में बन रहा है।
- इसमें 35 देश शामिल हैं – अमेरिका, यूरोपियन यूनियन, भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और रूस।
- यह मानव इतिहास का सबसे बड़ा वैज्ञानिक सहयोग (Scientific Collaboration) है।
- प्रोजेक्ट की लागत लगभग 22 बिलियन डॉलर आंकी गई है।
- लक्ष्य है: सूरज जैसी ऊर्जा (Fusion Power) को पृथ्वी पर बनाना।
ITER का मकसद है ऐसा रिएक्टर तैयार करना जिसमें Hydrogen के परमाणुओं को आपस में मिलाकर Helium बनाया जाए और उसी प्रक्रिया में अपार ऊर्जा निकले। यही प्रक्रिया सूरज और तारों में अरबों सालों से चल रही है।
👉 यह भी पढ़ें: ITER प्रोजेक्ट के बारे में और जानने के लिए ITER की आधिकारिक वेबसाइट पर पढ़ें।
☀️ न्यूक्लियर फिशन और फ्यूज़न: तारों की शक्ति
न्यूक्लियर फिशन
न्यूक्लियर फिशन वह प्रक्रिया है जिसमें किसी भारी तत्व जैसे यूरेनियम-235 या प्लूटोनियम-239 के परमाणु को तोड़कर ऊर्जा प्राप्त की जाती है। जब एक न्यूट्रॉन किसी भारी परमाणु के नाभिक से टकराता है, तो वह दो छोटे टुकड़ों में विभाजित हो जाता है और इसके साथ ही बड़ी मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है।
यही तकनीक आज दुनिया के अधिकांश परमाणु बिजलीघरों में उपयोग की जाती है और परमाणु बम भी इसी सिद्धांत पर आधारित होते हैं। हालाँकि, फिशन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें खतरनाक रेडियोधर्मी कचरा उत्पन्न होता है, जिसे सुरक्षित रखने के लिए हज़ारों वर्षों तक विशेष स्टोरेज की आवश्यकता पड़ती है। इसके अलावा, परमाणु दुर्घटनाओं का खतरा भी हमेशा बना रहता है, जैसा कि चर्नोबिल और फुकुशिमा जैसी घटनाओं से दुनिया पहले ही देख चुकी है।
न्यूक्लियर फ्यूज़न
न्यूक्लियर फ्यूज़न एक बिल्कुल अलग और कहीं अधिक सुरक्षित प्रक्रिया है। इसमें हल्के परमाणु जैसे हाइड्रोजन के आइसोटोप (ड्यूटेरियम और ट्रिटियम) आपस में मिलकर हीलियम का निर्माण करते हैं और इस प्रक्रिया में अत्यधिक ऊर्जा निकलती है। यही वह प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसके कारण सूरज और अन्य सभी तारे चमकते और ऊर्जा देते हैं। धरती पर वैज्ञानिक इसी प्रक्रिया को दोहराने की कोशिश कर रहे हैं ताकि हमें सूरज जैसी ऊर्जा प्राप्त हो सके।
फ्यूज़न का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें रेडियोधर्मी कचरा नहीं बनता, दुर्घटना का खतरा लगभग न के बराबर होता है, और इसका ईंधन समुद्र के पानी से आसानी से निकाला जा सकता है। वास्तव में, फ्यूज़न ऊर्जा इतनी अधिक शक्तिशाली है कि थोड़ी सी मात्रा में ईंधन लाखों घरों को बिजली प्रदान करने में सक्षम हो सकता है।
📊 फ्यूज़न और फिशन में अंतर
| विशेषता | न्यूक्लियर फिशन (Fission) | न्यूक्लियर फ्यूज़न (Fusion) |
|---|---|---|
| प्रक्रिया | भारी परमाणु (जैसे Uranium) को तोड़कर ऊर्जा निकालना | हल्के परमाणु (Hydrogen Isotopes) को मिलाकर ऊर्जा निकालना |
| ईंधन | यूरेनियम-235, प्लूटोनियम-239 | ड्यूटेरियम और ट्रिटियम (Hydrogen के Isotopes) |
| तापमान की आवश्यकता | अपेक्षाकृत कम (कुछ लाख °C) | बहुत अधिक (लगभग 150 मिलियन °C) |
| ऊर्जा उत्पादन | सीमित और खतरनाक अपशिष्ट के साथ | बहुत अधिक और स्वच्छ ऊर्जा |
| कचरा (Waste) | रेडियोधर्मी और हज़ारों साल तक खतरनाक | लगभग न के बराबर |
| दुर्घटना का खतरा | अधिक (जैसे चर्नोबिल, फुकुशिमा) | बहुत कम, लगभग नगण्य |
| कहाँ होता है प्रयोग | परमाणु बिजलीघर, परमाणु बम | सूरज और तारे, तथा भविष्य के फ्यूज़न रिएक्टर (ITER) |
🌞 सूरज जैसी ऊर्जा की ज़रूरत
सूरज के भीतर फ्यूज़न प्रक्रिया लगातार चलती रहती है और यही हमारे पूरे सौरमंडल को ऊर्जा प्रदान करती है। सूरज के कोर का तापमान लगभग 15 मिलियन डिग्री सेल्सियस यानी डेढ़ करोड़ डिग्री होता है। इस अत्यधिक गर्मी और दबाव के कारण हाइड्रोजन परमाणु आपस में मिलकर हीलियम बनाते हैं और विशाल मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जित करते हैं।
लेकिन धरती पर स्थिति बिल्कुल अलग है क्योंकि यहाँ उतना गुरुत्वाकर्षण दबाव उपलब्ध नहीं है जितना सूरज में होता है। यही कारण है कि धरती पर फ्यूज़न को सफल बनाने के लिए हमें सूरज से भी कई गुना अधिक तापमान पैदा करना पड़ता है।
फ्रांस में चल रहा ITER प्रोजेक्ट इसी चुनौती को पूरा करने का प्रयास है। यहाँ वैज्ञानिकों को फ्यूज़न प्रक्रिया को नियंत्रित ढंग से शुरू करने के लिए लगभग 150 मिलियन डिग्री सेल्सियस तक तापमान पहुँचाना होगा। यह तापमान सूरज के कोर से लगभग दस गुना अधिक है। इतनी अधिक गर्मी इसलिए आवश्यक है क्योंकि हाइड्रोजन के नाभिक, जिनमें धनात्मक आवेश होता है, आपस में ज़बरदस्त प्रतिकर्षण बल (रिपल्शन) पैदा करते हैं। उन्हें आपस में टकराने और जुड़ने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की ज़रूरत पड़ती है, जो केवल इतनी उच्च तापमान की स्थिति में ही संभव हो सकता है।
यदि यह प्रयास सफल होता है, तो यह मानव सभ्यता के लिए ऊर्जा का असीमित और सुरक्षित स्रोत साबित हो सकता है।
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🧲 सुपरमैग्नेट – “सेंट्रल सोलोनोइड”
ITER की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है इसका सुपरमैग्नेट, जिसे Central Solenoid कहा जाता है।
- ऊँचाई: 18 मीटर (6-मंज़िला इमारत जितनी)
- चौड़ाई: 4.25 मीटर
- वज़न: लगभग 1000 टन
- ताकत: 13 Tesla (जो पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से 2.8 लाख गुना अधिक है)
इसकी ताकत इतनी ज़्यादा है कि यह एक एयरक्राफ्ट कैरियर को 2 मीटर हवा में उठा सकता है।
सुरक्षा और मजबूती
इस मैग्नेट को पकड़ने के लिए जो ढांचा बनाया गया है, वह इतना मज़बूत है कि यह Space Shuttle के launch force से भी 2 गुना ज्यादा दबाव सह सकता है।

⚙️ यह मैग्नेट कैसे काम करता है?
🔄 Plasma containment
फ्यूज़न रिएक्शन के लिए Hydrogen gas को अत्यधिक गर्म करके Plasma में बदला जाता है। Plasma को Magnetic Field के अंदर कैद करना ज़रूरी है, क्योंकि यह इतना गर्म होता है कि किसी भी धातु को तुरंत पिघला देगा।
🍩 Tokamak (चुंबकीय बोतल) design
ITER का रिएक्टर एक Tokamak कहलाता है – यह एक डोनट-आकार (doughnut-shaped) का चेंबर है। इसमें सुपरमैग्नेट Plasma को स्थिर और नियंत्रित रखता है ताकि फ्यूज़न लगातार चलता रहे।
🌐 पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से तुलना
- पृथ्वी का Magnetic Field: लगभग 50 माइक्रोटेस्ला
- ITER मैग्नेट का Field: 13 Tesla
अगर तुलना करें तो ITER का सुपरमैग्नेट पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से 280,000 गुना ज़्यादा शक्तिशाली है। यह मानव इतिहास का सबसे शक्तिशाली मैग्नेट है।
♻️ स्वच्छ ऊर्जा की ओर कदम
- यह तकनीक कार्बन-फ्री ऊर्जा देगी।
- कोई ग्रीनहाउस गैस नहीं निकलेगी।
- रेडियोधर्मी कचरा बहुत कम होगा।
- भविष्य में यह कोयला, तेल और गैस की जगह ले सकता है।
✅ संभावित फायदे
- असीमित ऊर्जा स्रोत: समुद्र के पानी से Hydrogen लेकर ऊर्जा बनाई जा सकती है।
- सुरक्षित तकनीक: इसमें परमाणु विस्फोट या मेल्टडाउन का खतरा नहीं।
- क्लाइमेट चेंज से लड़ाई: कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य।
- लंबी अवधि का समाधान: आने वाली पीढ़ियों को ऊर्जा की चिंता नहीं होगी।
🚧 चुनौतियाँ और सीमाएँ
- बहुत अधिक लागत (22 बिलियन डॉलर से ज़्यादा)
- जटिल तकनीकी समस्याएँ – Plasma confinement बहुत मुश्किल है।
- समय – 2035 तक ITER से पहला plasma टेस्ट होगा।
- ऊर्जा दक्षता – अब तक किसी भी फ्यूज़न रिएक्टर ने प्रयोग से ज़्यादा ऊर्जा पैदा नहीं की है।
🔮 भविष्य की संभावनाएँ
ITER सफल हुआ तो:
- दुनिया को लगभग असीमित और सस्ती बिजली मिलेगी।
- देशों की तेल और गैस पर निर्भरता कम होगी।
- क्लाइमेट चेंज रोकने में बड़ा कदम होगा।
- ऊर्जा स्वतंत्रता मिलेगी और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर गहरा असर पड़ेगा।
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🏁 निष्कर्ष
ITER प्रोजेक्ट सिर्फ एक वैज्ञानिक प्रयोग नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता का भविष्य तय कर सकता है।
“स्टार इन अ बॉटल” बनाना कभी विज्ञान-कथा (Science Fiction) लगता था, लेकिन आज यह हकीकत बन रहा है।
फ्रांस में बना यह सुपरमैग्नेट दिखाता है कि अगर दुनिया मिलकर काम करे तो हम ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण जैसी सबसे बड़ी चुनौतियों का समाधान कर सकते हैं।
भविष्य में जब यह तकनीक पूरी तरह विकसित होगी, तो हो सकता है हमारे बच्चे एक ऐसी दुनिया में रहें जहाँ बिजली सस्ती, असीमित और पूरी तरह स्वच्छ होगी।
📚 FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
क्या ITER से हमें तुरंत बिजली मिलेगी?
नहीं। ITER एक प्रयोग है। असली बिजली उत्पादन के लिए अगले चरण में DEMO प्रोजेक्ट बनेगा।
क्या यह ऊर्जा सुरक्षित है?
हाँ, इसमें meltdown या बड़े विस्फोट का खतरा नहीं होता।
फ्यूज़न और फिशन में क्या अंतर है?
फिशन में परमाणु टूटते हैं, फ्यूज़न में परमाणु जुड़ते हैं। फ्यूज़न ज़्यादा सुरक्षित और शक्तिशाली है।
ITER कब तक शुरू होगा?
2035 में पहला plasma टेस्ट होने की संभावना है।
क्या यह climate change रोकने में मदद करेगा?
हाँ, अगर फ्यूज़न तकनीक व्यावसायिक स्तर पर आ जाती है तो यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को बहुत हद तक कम कर सकती है।



